इसी का गलत लाभ उठाते हुए अमेरिका और उसके सहयोगी, शरीफाना लिबास में अपना अधिपति संसार पर थोपने में सफल हुए। वह बात करते हैं मानवाधिकार की लेकिन उनकी मुराद पश्चिमी हित होते हैं, वह बात करते हैं डेमोक्रेसी की लेकिन उसके स्थान पर विभिन्न देशों में सैन्य हस्तक्षेप करते हैं, वह बात करते हैं आतंकवाद के खिलाफ जंग की और शहरों और गांवों में रहने वाले निहत्थे लोगों को अपने बमों और हथियारों का निशाना बना देते हैं। उनकी निगाह के अनुसार मानवता पहले, दूसरे और तीसरे दर्जे के नागरिकों में बटी है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के इंसानों की जानें बे कीमत और अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में (रहने वाले इंसानों की जान) बहुत कीमती समझी जाती है। अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा महत्वपूर्ण जबकि शेष संसार की सुरक्षा को कोई महत्व नहीं दिया जाता है।यातनाएं देना और हत्या करना अगर किसी अमेरिकी, ज़ायोनी या उनके पिठ्ठू लोगों के हाथों से हो तो वैध और उसकी अनदेखी की जा सकती है। उनकी खुफिया जीलों में बेसहारा, वकील की सुविधा से वंचित और बिना किसी न्यायिक कार्यवाही के कैदियों से निंदनीय और घृणित, व्यवहार के गवाह हैं और यह सब उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाते हैं। अच्छे और बुरे की सराहना पूरी तरह एकतरफा होती है। वह अपने हितों को अंतरराष्ट्रीय नियमों का नाम देकर विश्व समुदाय (की मांग) का नाम देकर देशों पर थोप देते हैं। अपने एकाधिकार वाले प्रबंधित मीडिया द्वारा अपने झूठ को सच, बातिल को हक़ और अत्याचार को न्याय बनाकर पेश करते हैं और हर उस वास्तविकता को जो उनके धोखे को ज़ाहिर करती हों झूठ और हर हक़ मांग को विद्रोह का नाम दे देते हैं।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना और उसका रूप अतार्किक और सरासर अलोकतांत्रिक है। यह एक खुली हुई डिकटेटरशिप, दकियानूसी, रद्द की जाने वाली और इक्सपाएर व्यवस्था है।दोस्तो! यह घटिया और नुक़सान पहुंचाने वाली परिस्थितियं जारी रहने के योग्य नहीं है. इस गलत विश्व व्यवस्था से सब थक चुके हैं. अमरीका में दौलत और सत्ता के केन्द्रों के खिलाफ निन्नानवे फीसदी लोग आंदोलन कर रहे हैं और यूरोपीय देशों में पब्लिक का अपनी सरकारों की आर्थिक नीतियों पर एतेराज़ कर रहे हैं। इस स्थिति से पता चलता है कि पब्लिक के सब्र करने का समय ख़त्म हो चुका है। इस घटिया स्थिति का कोई समाधान खोजना चाहिए।गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देशों का व्यापक, तर्कसंगत और मज़बूत संपर्क इस समाधान के प्रयास में बहुत प्रभावी हो सकता है।अंतर-राष्ट्रीय सुरक्षा वर्तमान दौर की सबसे अहेम आवश्यकताओं में से एक है और सामान्य तबाही के खतरनाक हथियारों को नाबूद करने की तत्काल आवश्यकता और सभी की यही मांग है। आज के संसार में सुरक्षा एक सामान्य आवश्यकता है। जो लोग अपने हथियारों के स्टोर मानवता विरोधी हथियारों से भर रहे हैं, उन्हें खुद को सुरक्षा के ज़िम्मेदार के रूप में पेश करने का अधिकार नहीं है। निःसंदेह यह (हथियार) उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकते। बड़े अफ़सोस की बात है कि आज यह देखने में आता है कि सबसे अधिक परमाणु हथियार रखने वाले देश अपनी फौजी व्यवस्था से इन जानलेवा और खतरनाक हथियारों को ख़त्म करने में गंभीर नहीं हैं और इसका संकल्प नहीं रखते बल्कि उन्हें खतरों से निपटने का साधन और अपनी राजनीतिक और अंतर-राष्ट्रीय साख की एक महत्वपूर्ण कसौटी मानते हैं। यह कल्पना बिल्कुल गलत है और इसे स्वाकार नहीं किया जा सकता है।परमाणु हथियारों से न सुरक्षा हासिल होती है और न राजनीतिक ताक़त बढ़ती है बल्कि यह (हथियार) इन दोनों चीज़ों के लिए खतरनाक है। सन उन्नीस सौ नब्बे के दशक की घटनाओं से साबित हो गया कि इन हथियारों की मौजूदगी पूर्व सोवियत संघ जैसी सरकार को भी बचा नहीं सकती। आज भी हम ऐसे देशों को जानते हैं जो परमाणु बम के मालिक होने के बावजूद अशांति का शिकार हैं।ईरान परमाणु, रासायनिक और इसी तरह के अन्य नरसंहार करने वाले हथियारों के इस्तेमाल को माफ़ न किये जाने वाला एक बड़ा पाप समझता है। हमने परमाणु हथियारों से मुक्त मिडिल ईस्ट का नारा बुलंद किया है और उसकी पाबंदी कर रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम परमाणु उर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल और परमाणु ईंधन की पैदावार के अधिकार से हाथ खींच ले। अंतर-राष्ट्रीय नियमों के हिसाब से उर्जा का शांतिपूर्ण इस्तेमाल सभी देशों का हक़ है। सबको अपने देश और अपनी राष्ट्र की अलग अलग आवश्यकताओं के हिसाब से इस साफ सुथरी उर्जा के इस्तेमाल का अवसर मिलना चाहिए और इस अधिकार का हासिल करना, दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। कुछ पश्चिमी देश जिनके पास परमाणु हथियार हैं और जो उसके ग़ैर क़ानूनी इस्तेमाल के दोषी हैं परमाणु उर्जा की पैदावार पर भी अपनी एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं। संदिग्ध कदम उठाए जा रहे हैं कि परमाणु ईंधन की पैदावार और बिक्री पर कुछ संस्थाओं का एकाधिकार बाक़ी रहे, जिनके नाम तो अंतर-राष्ट्रीय हैं लेकिन वास्तव में वह कुछ पश्चिमी देशों के पंजे में जकड़े हुए हैं।हमारे इस ज़माने का सबसे बड़ा तमाशा यह है कि अमेरिका जिसके पास सबसे अधिक जानलेवा परमाणु हथियार और सामान्य तबाही के अन्य हथियार हैं और वह उनका इस्तेमाल करने वाला अकेला देश है, आज परमाणु अप्रसार का ठेकेदार बनना चाहता है। उन्होंने और उनके पश्चिमी साथियों और सहयोगियों ने ग़ासिब ज़ायोनी शासन को परमाणु हथियारों से लैस कर उसे इस संवेदनशील क्षेत्र के लिए बहुत बड़े खतरे में बदल दिया है लेकिन मक्कारों की यही पार्टी स्वतंत्र देशों को परमाणु उर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल करते हुए भी नहीं देखना चाहती। यहां तक कि परमाणु दवाओं और अन्य शांतिपूर्ण इंसानी उद्देश्यों के इस्तेमाल में भी परमाणु ईंधन को रोकने के लिए अपनी पूरी ताक़त का इस्तेमाल कर रही है। परमाणु हथियारों पर उनकी चिंता तो उनका झूठा बहाना है। ईरान के बारे मैं उन्हें खुद भी पता है कि वह सरासर झूठ बोल रहे हैं! लेकिन जब राजनीति में आध्यात्मिकता बाकी न रह जाये तो वह झूठ को भी जायज़ कर देती है। इक्कीसवीं सदी में जो परमाणु धमकी दे और उस पर उसे शर्म भी नहीं आए क्या वह झूठ से क्यों परहेज़ करेगा या उस पर क्यों शर्म करेगा?!.....166
30 अगस्त 2012 - 19:30
समाचार कोड: 342395
वह बात करते हैं मानवाधिकार की लेकिन उनकी मुराद पश्चिमी हित होते हैं, वह बात करते हैं डेमोक्रेसी की लेकिन उसके स्थान पर विभिन्न देशों में सैन्य हस्तक्षेप करते हैं, वह बात करते हैं आतंकवाद के खिलाफ जंग की और शहरों और गांवों में रहने वाले निहत्थे लोगों को अपने बमों और हथियारों का निशाना बना देते हैं...........